पंकज अच्छा बताओ आज शाम को कॉलेज के बाद फ्री हो?
अनामिका- हाँ, बोलो क्या काम है।
पंकज- कुछ ख़ास नहीं, मैं बस सोच रहा था कि, आज शाम को चाय पीने चले, इस हफ्ते मैं तुम्हारे साथ गया ही नहीं कहीं बाहर घूमने इसी बहाने से हमारा घूमना भी हो जाएगा, तो आज को मिलेंगे या नहीं?
अनामिका- नहीं, मुझे नहीं पीनी चाय, तुम्हारा हर बार का है, उसी बेकार सी टपरी पर ले जाओगे और फिर से वही चाय पिलाओगे।
नहीं, मैं नहीं आ रही तुम्हारे साथ।
पंकज- यार, प्लीज चल ले ना।
अनामिका- नहीं मतलब नहीं, मुझे नहीं पीनी तुम्हारी उस बेकार सी टपरी की चाय में। हर बार तुम मुझे बस वहीं लेकर जाते हो, आखिर ऐसा है क्या वहां? (अनामिका ने थोड़ा गुस्से से और खीझते हुए पूछा।)
पंकज- एक शर्त पर बताऊंगा।
अनामिका- कैसी शर्त? (अनामिका ने फिर से गुस्से से पूछा।)
पंकज- बस एक आखिरी बार उसी टपरी पर मेरे साथ चाय पीने चलो, उसी टपरी पर सब कुछ बताऊंगा।
अनामिका ने थोड़ा सोचा और फिर जवाब दिया
अनामिका- अच्छा ठीक है, पर यह आखिरी बार होगा, कि मैं तुम्हारे साथ उस टपरी पर जा रही हूँ।
पंकज- ठीक है। ( हल्का सा मुस्कुरा कर पंकज ने जवाब दिया।)
शाम के वक़्त चाय पीते हुए
अनामिका- हाँ, अब बताओ कि इस क्या है, इस चाय में और विशेषकर इसी टपरी की चाय में?
पंकज- हम्म, बताता हूँ (एक चुस्की चाय की लेते हुए बोला)
पंकज- हाँ, तो सुनो
शायद ख़ास इस चाय में या चाय की टपरी में नहीं है। हमें मिले को तो शायद कुछ ही महीने हुए हैं, पर मैं यहाँ बचपन से आ रहा हूँ। मैं और मेरे बाबा हर शनिवार और रविवार इसी चाय की टपरी पर चाय पीने आते थे। एक बार की बात है, दसवीं के परिणाम की शाम थी, यूँ तो ख्यालों से मैं बहुत आजाद था, कि जितने भी अंक आये सब ठीक ही होता है, पर उस दिन नाजाने क्यूँ, कुछ ऐसा हुआ की उम्मीद से थोड़े अंक कम आये तो मैं बस, उस दिन टूट गया था, रोया नहीं था पर बाबा शायद समझ गए थे, कि मैं परेशान हूँ अपने अंको को लेकर।
तो बस, बाबा ने सर पर हाथ रखते हुए कहा, चलो चाय पीने चलते है।
हमारे यहाँ आने पर बाबा, ने मुझे समझाया, बेटा ज़िन्दगी चाय जैसी है, इसमें अगर कुछ ज्यादा डालोगे या कुछ कम डालोगे तो इसका स्वाद बिलकुल भी नहीं आएगा, इसी तरह से अपने जीवन में अपने दिल पर किसी भी चीज़ को हावी मत होने देना, फिर चाहे वो दुःख हो या फिर ख़ुशी। हाँ, वह सबक आज भी मुझे याद है।
और उसके बाद जब कॉलेज में हुआ तो, कुछ क्लासेज बंक करना, दोस्तों के साथ की वो हँसी-मज़ाक, नाजाने ज़िन्दगी के कितने ही पलों को इसी चाय की टपरी पर जीया है मैंने।
पास ही में, एक बूढ़े अंकल का एक्सीडेंट हुआ था, तो उन्हें अस्पताल लेजाना, उन्हें खून की जरूरत थी तो हम सब दोस्तों ने मिलकर अपना खून भी दिया था।
नाजाने ज़िन्दगी की कितनी शामों को यहाँ बिताया है मैंने, कितनी ही फ़िक्र होती थी ज़िन्दगी की, सब इस चाय में घोल कर पी गया मैं।
और एक ख़ास बात बताऊं?
अनामिका-हाँ, बोलो। (पंकज को एकटुक देखते हुए, क्योंकि पंकज यह सब बताते हुए कुछ भावुक सा हो गया था।)
पंकज-(अपनी जेब से रुमाल निकालते हुए) यह लो तुम्हारा रुमाल
अनामिका-मेरा रुमाल। (थोड़ा सा सोचते हुए अनामिका ने कहा) यह रुमाल तो शायद कॉलेज के पहले दिन कहीं खो गया था, यह मुझे इसीलिए याद है, क्योंकि यह रुमाल मुझे मेरी माँ ने भेंट किया था।
पंकज- हाँ मुझे पता है, तुमने मुझे पिछले हफ्ते बताया था कि, कॉलेज के पहले दिन ही तुम्हारा रुमाल खो गया था।
अनामिका- इसका मतलब यह रुमाल पहले दिन से तुम्हारे पास है?(अनामिका ने गुस्से से पूछा।)
पंकज- हाँ, पहले दिन से मेरे पास है, और यह रुमाल भी मुझे इसी, चाय की टपरी पर मिला था। जब तुम अपनी सहेलियों के साथ यहाँ आयी थी, तो तुम इसे यहाँ भूल गयी थी। और मैंने इसे अपने पास रख लिया था।
अनामिका- तो तुमने मुझे, इसे वापस क्यों नहीं किया। ( अनामिका ने गुस्से में पूछा।)
पंकज- प्यार की निशानियाँ, वापस कौन करता है पागल।
इस पर दोनों मुस्कुरा दिए, और पंकज ने कहा-
चलो अब चलते है, बहुत देर हो गयी मैं पैसे देकर आता हूँ।
अनामिका- पैसे देने की कोई जरूरत नहीं है, खाते में लिखवा दो, अबसे हम यहीं चाय पीने आएंगे, हर शनिवार और रविवार को।
और दोनों बस उस शाम में डूबता सूरज का आंनद लेने वहीँ बैठ गए।

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